झूठ पकड़ने वाली मशीन किस प्रकार काम करती है?
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झूठ पकड़ने वाली मशीन को पॉलीग्राफ़ कहते हैं। इसका आविष्कार सन 1921 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में चिकित्सा के एक छात्र जॉन लारसन ने किया था और 1924 से पुलिस पूछताछ में इसका प्रयोग होता आ रहा है।
इसमें व्यक्ति को कुर्सी पर बैठाया जाता है और कई नलियां और तार उसके शरीर के निश्चित भागों पर लगाए जाते हैं जो शारीरिक गतिविधियों का निरीक्षण करते हैं।
फिर उससे कई सवाल पूछे जाते हैं। ये माना जाता है कि जब व्यक्ति झूठ बोलता है तो उसके शरीर में कुछ परिवर्तन होते हैं। पॉलीग्राफ़ के ज़रिए व्यक्ति की सांस, रक्तचाप, नाड़ी और पसीने में आए इसी परिवर्तन को नोट किया जाता है और बाद में पॉलीग्राफ़ के आंकड़ों का विश्लेषण होता है।
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